Friday 1st of May 2026

Hindi

प्राथमिक उपचार
परिचय
आधुनिक युग में जितनी ज्यादा आबादी बढ़ती जा रही है उतनी ही ज्यादा यातायात के साधनों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। आज हर घर में किसी न किसी के पास बाईक या कार जरूर होती है। सड़क पर निकलो तो लगता है कि गाड़ियों का मेला सा लग रहा है। गाडियों की बढ़ती संख्या के साथ ही दुर्घटनाएं भी बढ़ती जा रही है। सुबह घर से निकला व्यक्ति पक्के तौर पर नहीं कह सकता कि शाम को वह घर आ ही जाएगा। शाम तक उसके साथ किसी भी तरह की दुर्घटना घटित हो सकती है। दुर्घटना कई बार साधारण होती है जबकि कई बार जानलेवा होती है। कुछ दुर्घटनाएं ऐसी होती है जिसमें व्यक्ति को अपने शरीर का कोई अंग गंवाकर जिंदगी भर अपाहिज की जिंदगी बितानी पड़ती है। देखा जाए तो कहा जा सकता है कि आज के समय में लोग रोगों से ज्यादा दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवा रहे हैं।
एक सर्वेक्षण से पता चला है कि दस लाख की आबादी वाले शहर में हर साल लगभग द्दण्ण् व्यक्तियों की मृत्यु किसी न किसी दुर्घटना में होती है। जिन शहरों में यातायात के साधन अधिक है उन शहरों में मृत्युदर द्दण्ण् से भी ज्यादा हो सकती है। दुर्घटना में अपनी जान गंवाने वालों में सबसे अधिक मौत 18 से  30  वर्ष की आयु वाले लोगों की होती है, इसके बाद 30 से 50 वर्ष के लोगों की। अक्सर लोगों के साथ दुर्घटना उस आयु में अधिक होती है जब उनका जीवन संघर्षशील होता है यानि 25 से 35 के बीच। किसी दुर्घटना में अंग काट(फट सकते हैं, हड्डियां टूट सकती है तथा नाजुक अंगों में गंभीर चोट लग सकती है। यदि दुर्घटना में किसी व्यक्ति का अंग कट(फट जाता है, हड्डियां टूट जाती है या अन्य शारीरिक हानि होती है तो ऐसी स्थिति में समय रहते जल्दी से उपचार न मिलने पर छोटे से छोटा जख्म भी गंभीर हो सकता है जिसे जीवनभर भुगतना पड़ सकता है। इसी प्रकार कोई भी व्यक्ति कभी भी और किसी समय भी भयंकर रोग से पीड़ित हो सकता है जैसे( उसे अचानक पेट में तेज दर्द उठ सकता है, हार्ट(अटैक ९दिल का दौरा० पड़ सकता है, भोजन करते समय श्वासनली में भोजन का कोई ग्रास अटक जाने से सांस रुक सकती है। इस तरह की परिस्थितियों में पीड़ित व्यक्ति को तुरंत ही प्राथमिक उपचार की जरूरत पड़ती है।
अगर कोई व्यक्ति अचानक दुर्घटना(ग्रस्त हो जाता है, चाहे वह किसी भी कारण से हो जैसे( गाड़ी से टकराकर, ऊंचाई से गिरकर, पानी में डूबने से, सांस अटकने से, मिर्गी का दौरे पड़ने से या हार्टअटैक से। इन स्थितियों में पीड़ित व्यक्ति को तुरंत किसी चिकित्सक के पास ले जाने का समय नहीं होता जैसे( दिल का दौरा पड़ने पर पीड़ित को बेहोशी आती है और ऐसी अवस्था में अगर उसे घ मिनट तक कोई इलाज न मिले तो उसके मस्तिष्क को हानि पहुंचने की संभावना अधिक रहती है। ऐसी स्थिति में हमारे पास एक ही विकल्प होता है कि रोगी को तुरंत प्राथमिक उपचार दिया जाए। आज हर उस व्यक्ति को प्राथमिक उपचार की आवश्यकता है जो अचानक किसी दुर्घटना या किसी भयंकर रोग से पीड़ित होता है। कई बार दुर्घटना होने पर जब तक पीड़ित अस्पताल पहुंचता है तब तक उसकी हालत इतनी गंभीर हो जाती है कि उसे ठीक करना मुश्किल हो जाता है। कई बार अस्पताल पहुंचने में देर होने से शरीर को बहुत नुकसान हो चुका होता है जैसे( अधिक खून का बह जाना या इंफेक्शन की वजह से शारीरिक अंगों को काट देना, कभी(कभी देर हो जाने से पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु भी हो जाती है। ऐसी ही परिस्थितियों में प्राथमिक उपचार की आवश्यकता पड़ती है।
अब कई लोग सोचते होंगे कि प्राथमिक उपचार होता क्या हैरु और यह कैसे करते हैंरु किसी घायल या दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को तुरंत दी जाने वाली चिकित्सा को प्राथमिक चिकित्सा या उपचार कहते हैं। इस चिकित्सा का मुख्य उद्देश्य पीड़ित व्यक्ति के जीवन की रक्षा करना, उसे तुरंत राहत पहुंचाना और उसकी हालत को अधिक बिगड़ने से रोकना है। यह एक साधारण व्यक्ति द्वारा किसी पीड़ित व्यक्ति को चिकित्सकीय सुविधाएं मिलने तक दिए जाने वाली जीवनरक्षक चिकित्सा है।
प्राथमिक उपचार को प्राथमिक चिकित्सा, प्राथमिक सहायता तथा फर्स्ट(एड भी कहते हैं। प्राथमिक चिकित्सा सदियों से चली आ रही है। इस चिकित्सा के अंतर्गत कोई व्यक्ति अपने साथी आदि के किसी तरह की चोट लग जाने पर या उसके किसी दुघर्टना में ग्रस्त हो जाने पर उसका उसी समय और खुद ही इलाज करना शुरु करता है। फौजियों को ट्रेनिंग के समय प्राथमिक उपचार की ट्रेनिंग दी जाती है ताकि यदि उनका कोई साथी घायल हो जाए तो वह उसकी स्वयं ही चिकित्सा कर सकें। वैसे प्राथमिक उपचार की जानकारी हर किसी को होना जरूरी है ताकि किसी के सामने अगर किसी व्यक्ति को प्राथमिक उपचार की जरूरत हो तो वह उसकी मदद कर सकें।
‘प्राथमिक उपचार’ चिकित्सा और शल्यकर्म के वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित है परंतु यह रोगी की संपूर्ण चिकित्सा नहीं है। प्राथमिक उपचार करने वाले व्यक्ति को हमेशा यह ध्यान रखना चाहिए कि वह चिकित्सक नहीं है। उसकी जिम्मेदारी सिर्फ उसी समय तक रहती है जब तक पीड़ित व्यक्ति चिकित्सक के संरक्षण में नहीं पहुंच जाता है। रोगी को चिकित्सक के संरक्षण में पहुंचा दिए जाने के बाद उसकी जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है।
प्राथमिक उपचार में उचित जानकारी( दुर्घटना आदि होने के बाद कई बार ऐसा भी होता है कि प्राथमिक उपचार मिलने के बावजूद पीड़ित व्यक्ति की हालत सुधरने की बजाय और बिगड़ जाती है। उसकी हालत ऐसी हो जाती है कि बाद में उचित उपचार मिलने के बाद भी वह शारीरिक या मानसिक रूप से अपंग रह जाता है। प्राथमिक उपचार करने वाले से अनजाने में हुई जरा सी गलती पीड़ित के लिए घातक हो सकती है। इस स्थिति का मुख्य कारण है उपचारकर्ता को प्राथमिक उपचार के बारे में सही जानकारी न होना।
आमतौर पर लोगों के मन में यह धारणा रहती है कि प्राथमिक चिकित्सा के लिए पूर्व जानकारी लेने की कोई जरूरत नहीं होती लेकिन यह सही नहीं है क्योंकि कोई भी प्रशिक्षित चिकित्सक बिना प्रशिक्षण के उचित प्राथमिक चिकित्सा नहीं कर सकता। इसके अलावा अगर किसी रोगी की प्राथमिक चिकित्सा करते समय चिकित्सा करने वाले व्यक्ति से जरा सी भी गलती हो जाए तो पीड़ित व्यक्ति को उसका काफी गंभीर परिणाम भुगतना पड़ सकता है जैसे( अगर किसी व्यक्ति को दिल का दौरा पडा हो तो उसे उठाना, बैठना या कुछ खिलाना हानिकारक होता है और अगर प्राथमिक चिकित्सा करने वाले व्यक्ति को इस बारे में पूरी जानकारी नहीं होगी तो सोच लीजिए की इसका परिणाम क्या होगा। अस्पताल में इलाज करने के लिए प्रशिक्षित चिकित्सकों के पास सभी जरूरी उपकरण, दवाईयां और सुविधाएं उपलब्ध होती हैं लेकिन प्राथमिक उपचार करने वाले व्यक्ति के पास ऐसी कोई सुविधा उपलब्ध नहीं होती है। प्राथमिक उपचार की जरुरत अचानक पड़ती है जैसे( सड़क पर, कारखाने में, घर में, दफ्तर या अन्य स्थानों में अचानक हुई दुर्घटना के कारण। इसलिए ऐसी स्थिति में प्राथमिक चिकित्सा करने के लिए हमेशा तैयार रहना पड़ता है।
प्राथमिक उपचार करने वालों में कुछ गुणों का होना बहुत जरूरी है जैसे( पीड़ित की जांच करने की तेज क्षमता, सही सोच और समझ रखने का गुण और बिना किसी हड़बड़ी के जल्दी से जल्दी राहत पहुंचाने की क्षमता। प्राथमिक उपचार करने वाले व्यक्ति को हमेशा आपातकालीन स्थिति में शांति और धैर्य से रहना चाहिए। उसके अंदर भरपूर आत्मविश्वास होना चाहिए, उसके चेहरे या आवाज से कभी भी घबराहट या हड़बड़ी के भाव नहीं दिखाई देने चाहिए क्योंकि इससे पीड़ित की हालत और बिगड़ सकती है। इसके अलावा उसमें पीड़ित को दिलासा देते रहने का गुण होना चाहिए ताकि पीड़ित की मानसिक हालत में सुधार आ सके।
किसी भी पीड़ित व्यक्ति को प्राथमिक उपचार देने से पहले आसपास जमी भीड़ को हटाएं, इससे उपचार करने में बाधा नहीं आती और साथ ही पीड़ित व्यक्ति को ताजी हवा मिलती है जो उस समय उसके लिए बहुत जरुरी होती है।
प्राथमिक उपचार करने वाले व्यक्ति के लिए जरूरी निर्देश( किसी भी दुर्घटना की सूचना मिलते ही तुरंत दुर्घटना(स्थल पर पहुंचे और इसके बाद दुर्घटना(ग्रस्त व्यक्ति का नाम और पता मालूम करके उसके परिवारजनों को सूचना दें। सूचना भिजवाते समय दुर्घटना(स्थल की सही स्थिति की जानकारी होना जरूरी है।
प्राथमिक उपचार करने वाले व्यक्ति का सबसे पहला काम है कि अपने साथी या किसी और व्यक्ति को डॉक्टर को फोन करने के लिए और दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने का प्रबंध करने के लिए कहें। इसके बाद दुर्घटना(स्थल और पीड़ित व्यक्ति की हालत का शीघ्र निरीक्षण करें। अगर पीड़ित व्यक्ति का कोई अंग किसी गाड़ी, खंभे, दीवार आदि के नीचे दबा हो तो उसे तुरंत स्वयं या किसी और की मदद से बाहर निकालने की कोशिश करें। अगर कोई व्यक्ति जलते हुए मकान या जहरीली गैस से भरे हुए कमरे में हो तो उसे तुरंत बाहर निकाल लें। अगर कोई व्यक्ति बिजली के नंगे तार के संपर्क में हो तो उसे लकड़ी या रबड़ जैसी किसी कुचालक वस्तु की सहायता से तार से दूर करें। ऐसी स्थिति में प्राथमिक चिकित्सा करने वाले व्यक्ति को अपनी भी पूर्ण सावधानी बरतने की जरूरत है नहीं तो उसके खुद के लिए मुसीबत खड़ी हो सकती हैं।
अगर दुर्घटना(ग्रस्त व्यक्ति किसी झगड़े में घायल हुआ हो और उसके शरीर में चाकू(छुरी जैसी वस्तु धंसी हो या गोली लगी हो तो सबसे पहले पुलिस को खबर दें और फिर प्राथमिक उपचार शुरु करें। एक बात का ध्यान रखें कि दुर्घटना स्थल से किसी भी तरह के फिंगर(प्रिंट या दूसरे सबूत न मिटने पाएं क्योंकि अंगुलियों के निशान, पीड़ित व्यक्ति के पड़े रहने की स्थिति आदि से हमलावर को पहचानने एवं पकड़ने में पुलिस को मदद मिल सकती है।
प्राथमिक उपचार करने वाले व्यक्ति में कम से कम समय में दुर्घटना(स्थल का जायजा लेने और जल्दी से जल्दी सही डिसिजन लेकर पीड़ित को राहत पहुंचाने का गुण होना चाहिए। यह समय पीड़ित के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है और ऐसे समय में उपचारकर्ता की थोड़ी सी देरी या लापरवाही पीड़ित के जीवन को नुकसान पहुंचा सकती है।
अगर पीड़ित व्यक्ति होश में हो तो वह स्वयं अपनी स्थिति के बारे में बता सकता है जैसे( उसे कैसा महसूस हो रहा है, उसके किस अंग में अधिक दर्द है, सांस लेने में परेशानी हो रही है या नहीं आदि। इससे उपचार करने वाले को पीड़ित की सहायता करने में आसानी होगी और वह सबसे पहले ग्रस्त अंग की चिकित्सा करेगा।
पीड़ित व्यक्ति को देखकर उपचारकर्ता खुद भी उसकी स्थिति की गंभीरता का पता लगा सकता है जैसे( पीड़ित व्यक्ति का चेहरा पीला पड़ना, बंद होती आंखें, नब्ज का पता न चलना, आवाज का कमजोर होना, शरीर में कंपकंपाहट होना, किसी अंग का सूजना, फैली हुई आंखों की पुतलियां, चक्कर आना, शरीर का तापमान बढ़ा हुआ आदि। इस तरह के लक्षणों को उपचारकर्ता आसानी से देख सकता है और उसके आधार पर अपना कार्य कर सकता है।
अगर पीड़ित व्यक्ति बेहोश हो तो उपचारकर्ता को चाहिए कि वह उसकी सही स्थिति का पता लगाकर और उसकी जेब से उसकी डायरी या पहचान पत्र आदि निकालकर उसके परिवार वालों को उसकी हालत के बारे में सूचित करें। कुछ व्यक्ति अपनी जेब में हमेशा डॉक्टरी रिपोर्ट रखते हैं जिसे देखकर यह आसानी से पता लगाया जा सकता है कि व्यक्ति किस रोग से पीड़ित है। इसके बाद यह देखें कि पीड़ित व्यक्ति की सांस चल रही है या नहीं। यदि ठीक से सांस न चल रही हो तो यह देखें कि कहीं सांस नली में कुछ अटका हुआ तो नहीं है। यदि पीड़ित व्यक्ति को सांस लेने में कठिनाई हो रही हो या उसके दिल की धड़कन ठीक से न चल रही हो तो तुरंत उसका उपचार शुरु कर दें क्योंकि ऐसी स्थिति में कुछ सेकंड की देरी भी पीड़ित व्यक्ति की हालत को गंभीर कर सकती है। सांस न चलने की स्थिति में अपने मुंह से पीड़ित व्यक्ति को सांस दें। इसे क्रिया को कृत्रिम सांस क्रिया कहा जाता है।
पीड़ित व्यक्ति की सांस ठीक से चल रही हो और दिल की धड़कन भी ठीक हो तो यह मालूम करें कि उसके किसी अंग से खून तो नहीं निकल रहा है। यदि पीड़ित व्यक्ति के शरीर के किसी अंग से खून निकल रहा हो तो किसी तरह से उसे बंद करने का उपाय करें। यदि खून का निकलना बंद नहीं किया जाता तो इसके कारण पीड़ित के शरीर में खून की कमी हो सकती है जिससे उसकी हालत गंभीर हो सकती है।
यदि पीड़ित व्यक्ति के किसी बाहरी घाव से खून निकल रहा हो तो वह आसानी से पता लग जाता है लेकिन दुर्घटना के कारण आंतरिक अंगों में चोट लगने से अंदर ही अंदर खून का स्राव होने लगता है। यह खून शरीर से बाहर नहीं निकल पाता बल्कि शरीर के अंदर ही किसी खाली स्थान पर जमा होने लगता है जैसे( पेरीटोनियल कैविटी, थोरासिक कैविटी या कपाल आदि। इस तरह खून का निकलना बहुत खतरनांक होता है क्योंकि इसमें बाहर कोई चोट दिखाई नहीं देती लेकिन स्थिति इतनी गंभीर होती है कि व्यक्ति की मौत हो सकती है।
प्राथमिक उपचार करते समय ध्यान रखें कि दुर्घटना(ग्रस्त व्यक्ति शॉक में तो नहीं है या उसकी किसी अंग की हड्डी तो नहीं टूटी हुई है या उसके सिर, पीठ, पेट आदि पर चोट तो नहीं लगी है।
ज्यादातर दुर्घटनाएं सड़क पर तेजी से चलने वाले वाहनों के कारण होती हैं। इस प्रकार की दुर्घटनाओं में पीड़ित व्यक्ति को संक्रमण से बचाना भी जरुरी होता है क्योंकि सड़कों पर पड़ी धूल, गोबर, लीद, कचरे आदि में उपस्थित कीटाणु शीघ्र ही पीड़ित व्यक्ति की चोटों को संक्रमित कर सकते हैं।
सड़क पर दुर्घटना(ग्रस्त हुए व्यक्ति को प्राथमिक उपचार देने से पहले उसे किसी छायादार जगह में ले जाना चाहिए। बारिश हो रही हो, ठंडी हवा चल रही हो या बहुत तेज धूप हो तो पीड़ित व्यक्ति को जल्दी से जल्दी पास के किसी घर में ले जाएं। पर कुछ परिस्थितियां जैसे पीड़ित व्यक्ति के दिल की धड़कन बंद हो जाने या उसकी सांस रुक जाने या उसकी रीढ़ की हड्डी टूट जाने पर खराब मौसम में भी, रोगी के ऊपर छाती तानकर या कपड़ा ढककर या केवल अखबार ढककर सड़क या दुर्घटना(स्थल पर ही उसका उपचार शुरु कर देना चाहिए।
पीड़ित व्यक्ति को शुद्ध हवा में रखना चाहिए लेकिन उसे धूप से भी बचाकर रखना चाहिए। अगर दुर्घटना किसी खुली जगह पर हुई हो और किसी बड़ी हड्डी के टूटने के कारण रोगी को वहां से जल्दी हटा पाना संभव न हो तथा वहां धूप हो तो ऐसी स्थिति में रोगी के ऊपर छाता या चाद्दर तानकर धूप से उसका बचाव करें।
प्राथमिक उपचार करने के लिए पट्टी बांधने, खपच्ची लगाने, कृत्रिम सांस देने, मालिश करने आदि की जानकारी होनी चाहिए। प्राथमिक उपचारकर्त्ता को यह भी ज्ञान होना चाहिए कि अगर किसी समय किसी जरूरी वस्तु का अभाव हो तो उसकी पूर्ति किसी दूसरीवस्तु से की जा सकती है।
प्राथमिक चिकित्सक को तंदुरुस्त शरीर वाला होना चाहिए क्योंकि प्राथमिक चिकित्सा के दौरान कई बार ऐसी परिस्थितियां भी पैदा हो जाती है जिनमें कि प्राथमिक चिकित्सक को पीड़ित व्यक्ति को अपनी पीठ पर या गोद में उठाकर ले जाना होता है। इसके अलावा उसे भाग(दौड़ और पीड़ित की मालिश आदि और भी कई काम करने पड़ते हैं।
दुर्घटना(ग्रस्त व्यक्ति को कोई उत्तेजक औषधि बहुत सोच(समझकर देनी चाहिए। अगर ठंड ज्यादा हो तो उसे गर्म चाय, कॉफी, दूध आदि दिया जा सकता है। अगर पीड़ित व्यक्ति बेहोश हो तो नौसादर में चूना मिलाकर सुंघाने से वह होश में आ सकता है।
प्राथमिक चिकित्सक को समझदार, बुद्धिमान, दूरदर्शी, बहादुर, धैर्यवान और हंसमुख होना चाहिए। पीड़ित की परेशानी को समझकर उसकी जरूरी चिकित्सा करने में उसे बिल्कुल भी देर नहीं लगानी चाहिए।
प्राथमिक उपचारकर्त्ता के लिए जरूरी जानकारियां(
प्राथमिक उपचारकर्त्ता को सबसे पहले घटना(स्थल पर पहुंचकर पीड़ित व्यक्ति की जांच करके उसकी हालत की सही जानकारी लेनी चाहिए।
यदि पीड़ित व्यक्ति के दिल की धड़कन बंद हो गई हो तो बिना समय गंवाए उसकी रुकी हुई धड़कन को चालू करने का उपचार करना चाहिए।
यदि पीड़ित व्यक्ति की सांस बंद हो गई हो तो उसे तुरंत ही कृत्रिम सांस देनी चाहिए।
यदि पीड़ित व्यक्ति के शरीर से ज्यादा खून निकल रहा हो तो सबसे पहले उसे रोकने का उपाय करना चाहिए।
यदि पीड़ित व्यक्ति शॉक में हो तो तो तुरंत ही उसे शॉक से बाहर लाने का उपचार करें।
पीड़ित व्यक्ति के ऐसे जोड़ों और हड्डियों को देखें जिनके टूटने से उसे उठने(बैठने में कष्ट होता हो जैसे( कूल्हे की हड्डी, जांघ की हड्डी, घुटना आदि। प्राथमिक उपचार इस प्रकार दें कि पीड़ित व्यक्ति अस्पताल ले जाने लायक हो सके।
यदि दुर्घटना में पीड़ित व्यक्ति जल गया हो तो उसके घावों पर ठंडा पानी डालें।
पीड़ित व्यक्ति के आंख, नाक और कान की चोटों की ओर ध्यान दें।
पीड़ित व्यक्ति के शरीर की गहरी चोटों को साफ करके उनकी मरहम(पट्टी करें।
आखिर में पीड़ित व्यक्ति के पूरे शरीर की एकबार दुबारा से जांच करें। हो सकता है कि पहली बार जांच करने पर कुछ ऐसे लक्षणों की ओर ध्यान न गया हो जो किसी घातक चोट के संकेत हो सकते हैं जैसे( कानों से खून बहना, मस्तिष्क में लगी चोट आदि।
पीड़ित को खाने(पीने के लिए कुछ भी न दें। सिर्फ डॉक्टर की सलाह पर ही उसे पीने के लिए चाय या कॉफी जैसा कोई पेय दें। क्योंकि अगर तुरंत उसका ऑप्रेशन करने की जरूरत पड़ जाए तो खाया गया ठोस या तरल पदार्थ अड़चन पैदा कर सकता है।

2.

द्द्चीनी एक जहर है जो अनेक रोगोँ का कारण है ।
ड्ड चीनी एक जहर है जो अनेक रोगोँ का कारण है ।
चीनी बनाने की प्रक्रिया मेँ गंधक का सबसे अधिक प्रयोग होता है । गंधक माने पटाखोँ का मसाला ।
गंधक अत्यंत कठोर धातु है जो शरीर मेँ चला तो जाता है परंतु बाहर नहीँ निकलता
चीनी कॉलेस्ट्रॉल बढ़ाती है जिसके कारण हृदयघात या हार्ट अटैक आता है
चीनी शरीर के वजन को अनियन्त्रित कर देती है जिसके कारण मोटापा होता है
चीनी रक्तचाप या ब्लड प्रैशर को बढ़ाती है ।
चीनी ब्रेन अटैक का एक प्रमुख कारण है
चीनी की मिठास को आधुनिक चिकित्सा मेँ सूक्रोज़ कहते हैँ जो इंसान और जानवर दोनो पचा नहीँ पाते
चीनी बनाने की प्रक्रिया मेँ तेइस हानिकारक रसायनोँ का प्रयोग किया जाता है
चीनी डाइबिटीज़ का एक प्रमुख कारण है
चीनी पेट की जलन का एक प्रमुख कारण है
चीनी शरीर मे ट्राइ ग्लिसराइड को बढ़ाती है
चीनी पेरेलिसिस अटैक या लकवा होने का एक प्रमुख कारण है
चीनी बनाने की सबसे पहली मिल अंग्रेजोँ ने ज्ञडटड मेँ लगाई थी । उसके पहले भारतवासी शुद्ध देशी गुड़ खाते थे और कभी बिमार नहीँ पड़ते थे ।
चीनी से मिश्री पे आएँ और मिश्री से गुड़ पे आएँ।

3.
स्वस्थ रहना हो तो खाने पकाने के ढर्रे को बदलें स्वस्थ एवं नीरोग रहने के लिए कड़ी भूख लगने पर चबा( चबाकर खाएँ इस बहुमूल्य शर्त का नियमित पालन करने से ही पाचन ठीक तरह से होता चलता है तथा पेट में किसी तरह की शिकायत होने की संभावना नहीं रहती है। इसके लिए प्रायः निर्देश दिया जाता है( प्रातः तथा संध्या, खाने के लिए समय निर्धारित कर लें तथा जब चाहें, तब खाने से बचें। बार( बार मुँह चलाने तथा पेट में खाद्य पदार्थों को अनियंत्रित रूप से पहुँचाते रहने से भोजन ठीक तरह से कभी पच नहीं पाता। साथ ही भोज्य पदार्थ को सही रूप में चबायें ताकि उसमें पाचक रस की उपयुक्त मात्रा समाविष्ट करने का काम दाँत का ही है। यदि उसका उपयोग न किया गया है और जल्दी( जल्दी में भोजन को पेट की भट्ठी में झोंक दिया तो इसका परिणाम अपच दस्त तथा गैस उत्पत्ति के रूप में अनुभव किया जा सकता है।
खाने के साथ( साथ पकाने की गलत विधि से भी खाद्य पदार्थो के अधिकांश पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। तलने( भूनने व मिर्च( मसाले के समावेश के कारण वह जायकेदार तो अवश्य बन जाता है, परंतु स्वास्थ्य की दृष्टि से वह निरूपयोगी व बेकार ही साबित होता हैं।
इसके अतिरिक्त सब्जियों व फलादि को प्रायः छिलके उतारकर ही खाने के काम में लाया जाता है। इससे उसके अधिकांश पोषक तत्व हमारे किसी काम नहीं आ पाते। आहार विज्ञान की वर्तमानखोजों से यह तथ्य प्रमाणित हुआ है कि आलू के छिलके में एसकार्बिक एसिड ९विटामिन सी० की अधिकांश मात्रा उपलब्ध होती है। उसे हटा देने पर १२ से ३५ प्रतिशत विटामिन सी नष्ट हो जाता है। इसी तरह गाजर के छिलकों में ही विटामिन बी कॉम्पलेक्स, थियामिन, रिवोफ्लेबिन की पर्याप्त मात्रा पाई जाती है। सेव के छिलकों में एसकार्बिक एसिड की मात्रा पाई जाती है। सेव के छिलको मेंएसकार्बिक एसिड की मात्रा उसके गूदे की तुलना में १० गुना अधिक होती है तथा निआसिन वरिवोफ्लेबिन भी अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में उपलब्ध होता है। अभिज्ञात है कि एसकार्बिक एसिड ९विटामिन सी० स्कर्वी रोग, त्वचा व ऊत्तकों के अंतराल में रक्तस्राव तथा एनिमिया दांत टूटने आदि को रोकने की भूमिका निभाता है। यह प्रायः ताजे फल व सब्जियों से उपलब्ध होता है तथा प्रत्येक व्यक्ति के लिए ७० मिलीग्राम प्रतिदिन की मात्रा में आवश्यक होता है।
जहाँ कीटनाशक दवाईयाँ छिड़की जाती हैं वहाँ छिलको में वे सोख ली जाती हैं( इस लिए उनको अच्छी तरह धोकर या नमक के पानी से धोकर ही खाना उचित है।
अनाजों में भी पोषक तत्वों की अधिकांश मात्रा उसके बाह्य परतों व शीर्ष भाग में विद्यमान होती है, परंतु वर्तमान फैशनपरस्ती का शिकार अनाजों को भी होना पड़ा है। देखने में वह स्वच्छ व चमकीले तारे सदृश लगें, इसके लिए उसकी मिलों में घिसाई पिसाई की जाती है। चावल,दाल आदि की स्थिति यही है ।। गेहूँ को भी चक्की में पीसने तथा घर में उसके आटे से चोकर को पृथक कर डालने की प्रक्रिया अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। चावल को खाना बनाने से पूर्व बार( बार धोया जाता है तथा पका लेने के उपरांत उसके अतिरिक्त जल९माँड० को फेंक दिया जाता है। इन सब प्रक्रियाओं के परिणाम स्वरूप सच कहा जाए तो, हम पोषक तत्त्वों से हीन छूँछ का ही भक्षण करते हैं।
प्रायः सब्जियों को काट व छीलकर जल में काफी देर तक डुबोया जाता है, इससे उसके पोषकतत्व काफी मात्रा में जल में घुल जाते हैं। उदाहरण स्वरूप बंदगोभी को काटकर धोने से उसका ९ से१५ प्रतिशत एसकार्बिक एसिड १ से ५ प्रतिशत थियामिन और ३ प्रतिशत तक रिवोफ्लेबिन नष्ट हो जाता है। यदि उन्हें १ से ३ घंटे तक उसी तरह रहने दिया जाए, तो क्रमशः ८ प्रतिशत ११ प्रतिशतएसकार्बिक एसिड नष्ट हो जाते हैं। मूली को छीलकर २४ घंटे तक उसी स्थितिमें छोड़ देने से २७प्रतिशत विटामिन नष्ट हो जाते हैं। कटे हुए सेव में भी १ से २ घंटे में २० प्रतिशत और ३ घंटे में ३५प्रतिशत एसकार्बिक एसिड नष्ट हो जाता है। यह खुली हवा में आक्सीजन से प्रतिक्रिया करके नष्ट हो जाता है वैसे पूर्ण रूप में यह चयापचय प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने, कॉलेजन( स्वस्थ (त्वचा, अस्थि, सहायक ऊतक के निर्माण तथा जख्म (उपचार में सहायक, प्रोटीन को संश्लेषित करने, रक्त नलिका की संरचनात्मक सामर्थ्य को कायम रखने, कुछेक एमिनो एसिड़स के चयापचय तथा संक्रमण से रक्षा करने का कार्य संपादित करता है।
खाद्य पदार्थों में पोषक तत्वों को बचाने के लिए उसे अधिक उबालने तलने, भूनने के स्थान पर प्रेशर कूकर अथवा भाप से खाना पकाने की विधि अपनानी चाहिए। खाना कम तापमान पर पकाया जाए, कम समय में उसे तैयार किया जाए तथा कम चौड़े बर्तन में उसे पकाया जाए।
प्राचीन समय में व्यंजनों को रंगयुक्त बनाने के लिए केसर, धनिया व अन्य वनस्पतियों को प्रयुक्त किया जाता था। परंतु आज इसका स्थान कृत्रिम रंगों ने ले लिया है। इस समय विश्व में अधिकतर कृत्रिम रंगों का प्रयोग हो रहा है। भारत में ही अनेक कृत्रिम रंगों का आम प्रचलन है। आश्चर्य तो इस बात का है कि इन रंगों के खतरनाक साबित हो जाने के बाद भी इनका प्रयोग बढ़ता जा रहा है। परिणाम स्वरूप अनेकानेक रोग उत्पन्न होते पाये जा रहे हैं, जैसे प्रजनन अंग, पेट व जिगर का क्षतिग्रस्त होना, शरीर का विकास रूकना, खून में लाल कणों की कमी, जिगर पर छाले पड़ना आदि। बुद्धिमानी इसी में है कि हम इन अनुपयुक्त व अप्राकृतिक पदार्थों का सेवन न करें।
खाने के साथ( साथ उपवास का भी विशेष महत्त्व है। उससे शरीर रूपी मशीन को थोड़ा विश्राम करने का अवसर मिलता है तथा उसी अवधि में उसकी धुलाई( सफाई भी हो जाती है। उपवास के विषय में आयुर्वेद कहता है( ‘‘लंघनम् परमौषधम् ’’ अर्थात ‘‘उपवास सर्वश्रेष्ठ औषधि है।’’
९युग निर्माण योजना( २००५०
4.
भोजन के मेल
हमारे जीवन में यह जानकारी रखना बहुत जरूरी है कि कौन(कौन से भोजन का मेल सही है या कौन(कौन से गलत। आयुर्वेद में भी भोजन के मेल पर बहुत सारी बातें बताई गई हैं। इसमें कई पदार्थ एक दूसरे से मिलकर जहर के सामान हो जाते हैं जैसे शहद और घी बराबर खाने से जहर बन जाता है।
भोजन के अलग(अलग तत्वों को पचाने के लिए अलग अलग पाचक रसों की जरूरत पड़ती है। श्वेतसार की पाचनक्रिया क्षार रस से होती है जबकि प्रोटीन को अम्ल पचाता है। अगर दोनों प्रकार के भोजन साथ साथ खाये जायेंगे तो दोनों के पाचक रस साथ साथ बनेंगे। इस तरह अम्ल रस और क्षार रस मिलकर प्रभावहीन हो जाते हैं जिससे प्रोटीन सड़नें शुरू हो जाते हैं। जिससे पाचनक्रिया काम नहीं करती है।
इसी प्रकार एक ही समय में कई वस्तुएं सब्जी, फल, अचार, दही, खीर, मिठाई, पापड़, आदि एक साथ खाने से रासायनिक क्रिया शुरू हो जाती है और पाचन तंत्र खराब हो जाता है।
एक समय में एक ही प्रकार का खाना खाना उचित आहार है। यह सही है मिश्रित भोजन गलत कदम है। एक टाईम में कम से कम खानों के मिश्रण को आसानी से पचाया जा सकता है।
भोजन में एक समय फल और एक समय सलाद लेना चाहिए। इसे एकाहार भी कहते हैं।
अनुचित मेल(
दूध और दही के साथ केला।
दूध या दही के साथ मूली।
दूध के साथ दही।
शहद के साथ गर्म जल व और कोई गर्म पदार्थ।
शहद और मूली।
खिचड़ी और खीर।
दूध के साथ खरबूजा, खीरा, ककड़ी।
दही, पनीर।
फलों के साथ सब्जियां।
रात में मूली या दही।
गर्म दही।
कांसे के बर्तन में दस दिन तक रखा हुआ घी।
दाल के साथ शकरकन्द, आलू, कचालू।
दाल और चावल या दाल और रोटी।
दूध या दही के साथ रोटी।
जानकारी(
जिन्हें रोटी और चावल के साथ दाल खानी हों उन्हें अच्छी मात्रा में सब्जी का भी सेवन करना चाहिए।
उचित मेल(
आम और गाय का दूध।
दूध और खजूर।
चावल और नारियल की गिरी।
दाल और दही।
अमरूद के साथ सौंफ।
बथुआ और दही का रायता।
गाजर और मेथी का साग।
दही और आंवला चूर्ण।
श्वेतसार के साथ साग सब्जी।
मेवे के साथ खट्टे फल।
दाल और सब्जी।
सब्जी व चावल की खिचड़ी।
रोटी के साथ हरे पत्ते वाली सब्जी।
अंकुरित दालें और कच्चा नारियल।

5.
स्वस्थ जीवन सफलता जीवन की कुंजी
किसी भी व्यक्ति को अगर किसी भी कार्य में सफलता पानी है तो इसके लिए सबसे पहले उसके शरीर का स्वस्थ होना बहुत ही आवश्यक है क्योंकि जब तक स्वास्थ्य अच्छा नहीं होगा तब तक सफलता प्राप्त नहीं की जा सकती है। जिस मनुष्य का स्वास्थ्य अच्छा होता है उस मनुष्य का मस्तिष्क, सोचने(समझने की क्षमता तथा कार्य के प्रति निष्ठा सही होती है और तभी वह मनुष्य किसी भी कार्य को करने में सफलता प्राप्त कर पाता है। इसलिए स्वस्थ जीवन ही सफलता प्राप्त करने की कुंजी है।
स्वस्थ जीवन के लिए कुछ उपयोगी बातें इस प्रकार हैं(
पानी स्(
सभी व्यक्तियों को स्वस्थ रहने के लिए प्रतिदिन सुबह के समय में बिस्तर से उठकर कुछ समय के लिए पालथी मारकर बैठना चाहिए और कम से कम ज्ञ से घ गिलास गुनगुना पानी पीना चाहिए या फिर ठंडा पानी पीना चाहिए।
स्वस्थ रहने के लिए प्रत्येक व्यक्तियों को प्रतिदिन कम से कम ज्ञण् से ज्ञद्द गिलास पानी पीना चाहिए।
महत्वपूर्ण क्रिया स्(
सभी व्यक्तियों को स्वस्थ रहने के लिए प्रतिदिन दिन में द्द बार मल त्याग करना चाहिए।
सांसे लंबी(लंबी और गहरी लेनी चाहिए तथा चलते या बैठते और खड़े रहते समय अपनी कमर को सीधा रखना चाहिए।
दिन में समय में कम से कम द्द बार ठंडे पानी से स्नान करना चाहिए।
दिन में कम से कम द्द बार भगवान का स्मरण तथा ध्यान करें, एक बार सूर्य उदय होने से पहले तथा एक बार रात को सोते समय।
विश्राम स्(
सभी मनुष्यों को भोजन करने के बाद मूत्र(त्याग जरूर करना चाहिए।
प्रतिदिन दिन में कम से कम ज्ञ(द्द बार छ से ज्ञछ मिनट तक वज्रासन की मुद्रा करने से स्वास्थ्य सही रहता है।
सोने के लिए सख्त या मध्यम स्तर के बिस्तर का उपयोग करना चाहिए तथा सिर के नीचे पतला तकिया लेकर सोना चाहिए।
सोते समय सारी चिंताओं को भूल जाना चाहिए तथा गहरी नींद में सोना चाहिए और शरीर को ढीला छोड़कर सोना चाहिए।
पीठ के बल या दाहिनी ओर करवट लेकर सोना चाहिए।
सभी मनुष्यों को भोजन और सोने के समय में कम से कम घ घण्टे का अन्तर रखना चाहिए।
व्यायाम स्(
सभी व्यक्तियों को स्वस्थ रहने के लिए प्रतिदिन सुबह के समय में आधे घण्टे तक व्यायाम करना चाहिए तथा सैर या जॉगिंग करनी चाहिए।
सभी व्यक्तियों को आसन, सूर्य(नमस्कार, बागवानी, तैराकी, व्यायाम तथा खेल आदि क्रियाएं करनी चाहिए, जिनके फलस्वरूप स्वास्थ्य हमेशा अच्छा रहता है।
भोजन करने के बाद कम से कम द्दण् मिनट तक टहलना चाहिए जिसके फलस्वरूप स्वास्थ्य सही रहता है।
भोजन स्(
कभी भी भूख से ज्यादा भोजन नहीं करना चाहिए तथा जितना आवश्यक हो उतना ही भोजन करना चाहिए।
भोजन को अच्छी तरह से चबाकर तथा धीरे(धीरे और शांतिपूर्वक खाना चाहिए।
दिन में केवल द्द बार ही भोजन करना चाहिए।
सुबह के समय में कम से कम ड(ज्ञण् बजे के बीच में भोजन करना चाहिए तथा शाम के समय में छ(ठ बजे के बीच में भोजन कर लेना चाहिए। ऐसा करने से स्वास्थ्य हमेशा सही रहता है।
भोजन में बीज या खाद्यान्न उपयोग करने से पहले उसे रात भर पानी में भिगोकर रखना चाहिए। इसके बाद अगले दिन उनका उपयोग भोजन में करना चाहिए।
भोजन के एक भाग में अनाज तथा दूसरे भाग में सब्जियां होनी चाहिए।
ज्यादा पके हुए तथा ज्यादा कच्चे अन्न पदार्थों का भोजन नहीं करना चाहिए।
भोजन में वसायुक्त शुद्ध तेलों का ही इस्तेमाल करना चाहिए, जैसे( तिल का तेल या सूरजमुखी का तेल आदि।
भोजन में कच्चे पदार्थों का अधिक सेवन करना चाहिए जैसे( अंकुरित चीजें, ताजी और पत्तेदार हरी सब्जियां, सलाद, फलों का रस, नींबू तथा शहद मिला हुआ पानी, मौसम के अनुसार फल आदि।
दूध की जगह छाछ या दही का अधिक उपयोग करना चाहिए।
पका हुआ भोजन करने के लिए चोकर सहित आटे की रोटी, दलिए तथा बिना पॉलिश किए हुए चावल का उपयोग करना चाहिए।
सप्ताह में कम से कम ज्ञ बार फलों का रस पीकर उपवास रखना चाहिए।
स्वस्थ रहने के लिए जैसे ही बीमार पड़े तुरंत ही प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करना चाहिए।
कम उपयोग करने वाली चीजें स्(
मिर्च(मसाले, दालें, घी, आइसक्रीम, क्रीम, नमक, मिठाईयां, गिरीदार चीजें तथा पकाई हुई चीजों का भोजन में बहुत ही कम उपयोग करना चाहिए।
अधिक वजन उठाने का कार्य नहीं करना चाहिए।
बहुत ज्यादा कठिन व्यायाम नहीं करना चाहिए।
ऊंची एड़ी के जूते नहीं पहनने चाहिए।
टी।वी। तथा फिल्में आदि ज्यादा नहीं देखनी चाहिए।
इन पदार्थों के सेवन से बचें स्(
चाय, कॉफी, शराब, नशीली दवाईयां, धूम्रपान, सॉफ्ट ड्रिंक, तम्बाकू, पान, जर्दा तथा अन्य दूषित पदार्थ जिनसे शरीर को हानि होती हो, का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इन पदार्थों से शरीर का स्वास्थ्य केवल बेकार होता है सही कभी भी नहीं होता है।
चीनी, मैदा तथा पॉलिश किये हुए चावल का उपयोग नहीं करना चाहिए।
दूषित भोजन का सेवन न करें क्योंकि इसके सेवन से कई प्रकार के रोग हो सकते हैं और शरीर का स्वास्थ्य गिर सकता है।
रंगदार भोजन, फ्लेवर्ड, सिन्थेटिक, कृत्रिम खाद्य पदार्थ, डिब्बाबंद, ड्राइड तथा मिलावटी चीजों का सेवन न करें।
रिफाइंड तेलों का कम उपयोग करना चाहिए।
गैर(प्राकृतिक भोजन तथा पेय पदार्थों का उपयोग कम से कम करना चाहिए।
भूख न होने पर भोजन नहीं करना चाहिए।
ज्यादा चिंता नहीं करना चाहिए तथा किसी से नहीं डरना चाहिए।
ज्यादा गर्म तथा ज्यादा ठंडी चीजों का भोजन में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
वायु, जल तथा शोर वाले प्रदूषणों से बचना चाहिए।
हानिकारक प्रसाधन सामग्री व वस्त्र, औषधियुक्त साबुन व क्रीम का उपयोग नहीं करना चाहिए।
भोजन करने के समय में बीच(बीच में पानी नहीं पीना चाहिए।
भोजन करने के कम से कम ज्ञ घण्टे के बाद ही पानी पीना चाहिए।
रात के समय में देर से भोजन नहीं करना चाहिए।
भारी तथा ठोस भोजन नहीं करना चाहिए।
रात के समय में देर से नहीं सोना चाहिए।
अभ्यास स्(
अपनी आंखों को स्वस्थ बनाये रखने के लिए प्रतिदिन सुबह तथा शाम के समय में त्रिफला के पानी से आंखों को धोना चाहिए।
दिन में ज्ञ बार नमक मिले गुनगुने पानी से गरारे करने चाहिए, इसके फलस्वरूप स्वास्थ्य सही बना रहता है।
यदि कब्ज की शिकायत हो तो कुछ दिनों तक लगातार गुनगुने पानी से एनिमा क्रिया करनी चाहिए और पेट को साफ करना चाहिए।
स्वस्थ रहने के लिए सप्ताह में कम से कम ज्ञ बार वमन धौति क्रिया ९कुंजल या वमन० करनी चाहिए।
सप्ताह में कम से कम ज्ञ बार शरीर की मालिश करनी चाहिए तथा धूप(स्नान करना चाहिए, जिसके फलस्वरूप शरीर का स्वास्थ्य अच्छा बना रहता है।
प्रतिदिन सुबह के समय में अपने तालू पर अच्छी तरह मालिश करनी चाहिए।
हर समय खुश रहने की कोशिश करनी चाहिए तथा सभी व्यक्तियों से हंसना(बोलना चाहिए।
प्रतिदिन द्द बार माथे या आंखों पर पानी के छींटे मारने चाहिए तथा मुंह पर पानी मारना चाहिए जिसके फलस्वरूप स्वास्थ्य सही रहता है।
कुछ सावधानियां स्(
फलों और सब्जियों को खाने से पहले अच्छी तरह से धो लेना चाहिए तथा जो फल छीलकर खाने वाले हो उसे छीलकर ही खाने चाहिए।
किसी भी सब्जी तथा फलों को काटने से पहले अच्छी तरह से धो लेना चाहिए क्योंकि इन पर कीटनाशी तथा अन्य दूषित तत्व जमे होते हैं।
टी।वी। तथा पिक्चर आदि देखने के लिए उचित दूरी पर बैठकर देखें क्योंकि इससे आंखे खराब हो सकती हैं।
याद रखने लायक कुछ बातें स्(
औषधियां बीमारियों से ज्यादा खतरनाक होती हैं इसलिए औषधियों का उपयोग ज्यादा नहीं करना चाहिए।
स्वस्थ रहने के लिए पर्याप्त जगह, शुद्ध वायु, शुद्ध जल, धूप, व्यायाम तथा शारीरिक क्रिया करना बहुत ही आवश्यक हैं तथा इसके बाद उचित भोजन का करना आवश्यक है।
भोजन, नींद, व्यायाम तथा विश्राम सम्बंधी नियमों का पालन करना चाहिए तभी स्वास्थ्य ठीक प्रकार से बना रह सकता है।
किसी भी बीमार व्यक्ति के लिए जल औषधि तथा आहार दवा के सामान होता है अतस् किसी भी बीमारी को ठीक करने के लिए इनका उपयोग अधिक करना चाहिए।
किसी भी बीमारी को ठीक करने के लिए उपवास चिकित्सा का महत्वपूर्ण अंग है इसके द्वारा कई प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं।
किसी भी व्यक्ति को कोई भी कार्य करने के लिए जल्दबाजी नहीं करना चाहिए।
स्वस्थ रहने के लिए चिंता(फिक्र का त्याग कर देना चाहिए।
तेज मसालेदार तथा चिकनाईयुक्त सब्जियां व्यक्ति को बीमार कर देती हैं इसलिए इन चीजों का बहुत ही कम उपयोग करना चाहिए।
अच्छा स्वास्थ्य बनाये रखने के लिए कुछ आवश्यक बातों पर नजर स्(
सभी प्रकार के रोगों को ठीक करने की शक्ति शरीर में ही मौजूद होती है।
थकान, बीमारी, दर्द होने पर तथा तनाव की स्थिति या फिर जल्दबाजी में भोजन नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ता है।
किसी भी रोग को ठीक करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा का सहारा लेना चाहिए, क्योंकि यह चिकित्सा सर्वाधिक सुरक्षित और स्थायी होती है।
भोजन करने से आधा घण्टा पहले पानी पीना चाहिए तथा भोजन करने के कम से कम ज्ञ घण्टे के बाद ही पानी पीना चाहिए। भोजन करने के समय में कभी भी पानी नहीं पीना चाहिए।
रोग की अवस्था में उचित भोजन का ही उपयोग करना चाहिए तथा कभी भी ऐसा भोजन नहीं करना चाहिए जिससे बीमारी का प्रकोप और बढ़ जाए।
अच्छा स्वास्थ्य संतुलित भोजन और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण पर ही निर्भर करता है अतस् भोजन उतना ही करना चाहिए जितना आवश्यक हो।
नशीली चीजें, तम्बाकू, शराब तथा अन्य विषैले पदार्थों का उपयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि इन चीजों से स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ता है।
स्वस्थ रहने के लिए प्रतिदिन दिन में ज्ञण् से ज्ञद्द गिलास पानी पीना चाहिए।
रात के भोजन और सोने के बीच में कम से कम घ घण्टे का अन्तर रखना चाहिए इससे स्वास्थ्य सही रहता है।
धन से दवाई खरीदी जा सकती है स्वास्थ्य नहीं यह ध्यान रखना चाहिए।
चाय, कॉफी का ज्यादा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए क्योंकि इन चीजों से स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।
अनुशासित जीवन आपको दीर्घजीवी और खुशहाल बनाता है अतस् अपने जीवन में अनुशासित रूप अपनाना चाहिए।
परिवर्तन संसार का नियम है इसलिए इसके साथ(साथ छेड़(छाड़ नहीं करनी चाहिए।
शरीर, मस्तिष्क व आत्मा को शुद्ध रखने के लिए योग सबसे आसन तरीका है। इसलिए अपने जीवन में योग का अच्छी तरह से इस्तेमाल करना चाहिए।
किसी भी रोग को ठीक करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा और योग एक ही गाड़ी के द्द पहिए हैं।
रोग को ठीक करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा पर विश्वास करना बहुत ही आवश्यक है। इसके फलस्वरूप रोग जल्द ही ठीक हो जाता है।
6.
भोजन के मेल
हमारे जीवन में यह जानकारी रखना बहुत जरूरी है कि कौन(कौन से भोजन का मेल सही है या कौन(कौन से गलत। आयुर्वेद में भी भोजन के मेल पर बहुत सारी बातें बताई गई हैं। इसमें कई पदार्थ एक दूसरे से मिलकर जहर के सामान हो जाते हैं जैसे शहद और घी बराबर खाने से जहर बन जाता है।
भोजन के अलग(अलग तत्वों को पचाने के लिए अलग अलग पाचक रसों की जरूरत पड़ती है। श्वेतसार की पाचनक्रिया क्षार रस से होती है जबकि प्रोटीन को अम्ल पचाता है। अगर दोनों प्रकार के भोजन साथ साथ खाये जायेंगे तो दोनों के पाचक रस साथ साथ बनेंगे। इस तरह अम्ल रस और क्षार रस मिलकर प्रभावहीन हो जाते हैं जिससे प्रोटीन सड़नें शुरू हो जाते हैं। जिससे पाचनक्रिया काम नहीं करती है।
इसी प्रकार एक ही समय में कई वस्तुएं सब्जी, फल, अचार, दही, खीर, मिठाई, पापड़, आदि एक साथ खाने से रासायनिक क्रिया शुरू हो जाती है और पाचन तंत्र खराब हो जाता है।
एक समय में एक ही प्रकार का खाना खाना उचित आहार है। यह सही है मिश्रित भोजन गलत कदम है। एक टाईम में कम से कम खानों के मिश्रण को आसानी से पचाया जा सकता है।
भोजन में एक समय फल और एक समय सलाद लेना चाहिए। इसे एकाहार भी कहते हैं।
अनुचित मेल(
दूध और दही के साथ केला।
दूध या दही के साथ मूली।
दूध के साथ दही।
शहद के साथ गर्म जल व और कोई गर्म पदार्थ।
शहद और मूली।
खिचड़ी और खीर।
दूध के साथ खरबूजा, खीरा, ककड़ी।
दही, पनीर।
फलों के साथ सब्जियां।
रात में मूली या दही।
गर्म दही।
कांसे के बर्तन में दस दिन तक रखा हुआ घी।
दाल के साथ शकरकन्द, आलू, कचालू।
दाल और चावल या दाल और रोटी।
दूध या दही के साथ रोटी।
जानकारी(
जिन्हें रोटी और चावल के साथ दाल खानी हों उन्हें अच्छी मात्रा में सब्जी का भी सेवन करना चाहिए।
उचित मेल(
आम और गाय का दूध।
दूध और खजूर।
चावल और नारियल की गिरी।
दाल और दही।
अमरूद के साथ सौंफ।
बथुआ और दही का रायता।
गाजर और मेथी का साग।
दही और आंवला चूर्ण।
श्वेतसार के साथ साग सब्जी।
मेवे के साथ खट्टे फल।
दाल और सब्जी।
सब्जी व चावल की खिचड़ी।
रोटी के साथ हरे पत्ते वाली सब्जी।
अंकुरित दालें और कच्चा नारियल।
7.
स्वस्थ जीवन सफलता जीवन की कुंजी
किसी भी व्यक्ति को अगर किसी भी कार्य में सफलता पानी है तो इसके लिए सबसे पहले उसके शरीर का स्वस्थ होना बहुत ही आवश्यक है क्योंकि जब तक स्वास्थ्य अच्छा नहीं होगा तब तक सफलता प्राप्त नहीं की जा सकती है। जिस मनुष्य का स्वास्थ्य अच्छा होता है उस मनुष्य का मस्तिष्क, सोचने(समझने की क्षमता तथा कार्य के प्रति निष्ठा सही होती है और तभी वह मनुष्य किसी भी कार्य को करने में सफलता प्राप्त कर पाता है। इसलिए स्वस्थ जीवन ही सफलता प्राप्त करने की कुंजी है।
स्वस्थ जीवन के लिए कुछ उपयोगी बातें इस प्रकार हैं(
पानी स्(
सभी व्यक्तियों को स्वस्थ रहने के लिए प्रतिदिन सुबह के समय में बिस्तर से उठकर कुछ समय के लिए पालथी मारकर बैठना चाहिए और कम से कम ज्ञ से घ गिलास गुनगुना पानी पीना चाहिए या फिर ठंडा पानी पीना चाहिए।
स्वस्थ रहने के लिए प्रत्येक व्यक्तियों को प्रतिदिन कम से कम ज्ञण् से ज्ञद्द गिलास पानी पीना चाहिए।
महत्वपूर्ण क्रिया स्(
सभी व्यक्तियों को स्वस्थ रहने के लिए प्रतिदिन दिन में द्द बार मल त्याग करना चाहिए।
सांसे लंबी(लंबी और गहरी लेनी चाहिए तथा चलते या बैठते और खड़े रहते समय अपनी कमर को सीधा रखना चाहिए।
दिन में समय में कम से कम द्द बार ठंडे पानी से स्नान करना चाहिए।
दिन में कम से कम द्द बार भगवान का स्मरण तथा ध्यान करें, एक बार सूर्य उदय होने से पहले तथा एक बार रात को सोते समय।
विश्राम स्(
सभी मनुष्यों को भोजन करने के बाद मूत्र(त्याग जरूर करना चाहिए।
प्रतिदिन दिन में कम से कम ज्ञ(द्द बार छ से ज्ञछ मिनट तक वज्रासन की मुद्रा करने से स्वास्थ्य सही रहता है।
सोने के लिए सख्त या मध्यम स्तर के बिस्तर का उपयोग करना चाहिए तथा सिर के नीचे पतला तकिया लेकर सोना चाहिए।
सोते समय सारी चिंताओं को भूल जाना चाहिए तथा गहरी नींद में सोना चाहिए और शरीर को ढीला छोड़कर सोना चाहिए।
पीठ के बल या दाहिनी ओर करवट लेकर सोना चाहिए।
सभी मनुष्यों को भोजन और सोने के समय में कम से कम घ घण्टे का अन्तर रखना चाहिए।
व्यायाम स्(
सभी व्यक्तियों को स्वस्थ रहने के लिए प्रतिदिन सुबह के समय में आधे घण्टे तक व्यायाम करना चाहिए तथा सैर या जॉगिंग करनी चाहिए।
सभी व्यक्तियों को आसन, सूर्य(नमस्कार, बागवानी, तैराकी, व्यायाम तथा खेल आदि क्रियाएं करनी चाहिए, जिनके फलस्वरूप स्वास्थ्य हमेशा अच्छा रहता है।
भोजन करने के बाद कम से कम द्दण् मिनट तक टहलना चाहिए जिसके फलस्वरूप स्वास्थ्य सही रहता है।
भोजन स्(
कभी भी भूख से ज्यादा भोजन नहीं करना चाहिए तथा जितना आवश्यक हो उतना ही भोजन करना चाहिए।
भोजन को अच्छी तरह से चबाकर तथा धीरे(धीरे और शांतिपूर्वक खाना चाहिए।
दिन में केवल द्द बार ही भोजन करना चाहिए।
सुबह के समय में कम से कम ड(ज्ञण् बजे के बीच में भोजन करना चाहिए तथा शाम के समय में छ(ठ बजे के बीच में भोजन कर लेना चाहिए। ऐसा करने से स्वास्थ्य हमेशा सही रहता है।
भोजन में बीज या खाद्यान्न उपयोग करने से पहले उसे रात भर पानी में भिगोकर रखना चाहिए। इसके बाद अगले दिन उनका उपयोग भोजन में करना चाहिए।
भोजन के एक भाग में अनाज तथा दूसरे भाग में सब्जियां होनी चाहिए।
ज्यादा पके हुए तथा ज्यादा कच्चे अन्न पदार्थों का भोजन नहीं करना चाहिए।
भोजन में वसायुक्त शुद्ध तेलों का ही इस्तेमाल करना चाहिए, जैसे( तिल का तेल या सूरजमुखी का तेल आदि।
भोजन में कच्चे पदार्थों का अधिक सेवन करना चाहिए जैसे( अंकुरित चीजें, ताजी और पत्तेदार हरी सब्जियां, सलाद, फलों का रस, नींबू तथा शहद मिला हुआ पानी, मौसम के अनुसार फल आदि।
दूध की जगह छाछ या दही का अधिक उपयोग करना चाहिए।
पका हुआ भोजन करने के लिए चोकर सहित आटे की रोटी, दलिए तथा बिना पॉलिश किए हुए चावल का उपयोग करना चाहिए।
सप्ताह में कम से कम ज्ञ बार फलों का रस पीकर उपवास रखना चाहिए।
स्वस्थ रहने के लिए जैसे ही बीमार पड़े तुरंत ही प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करना चाहिए।
कम उपयोग करने वाली चीजें स्(
मिर्च(मसाले, दालें, घी, आइसक्रीम, क्रीम, नमक, मिठाईयां, गिरीदार चीजें तथा पकाई हुई चीजों का भोजन में बहुत ही कम उपयोग करना चाहिए।
अधिक वजन उठाने का कार्य नहीं करना चाहिए।
बहुत ज्यादा कठिन व्यायाम नहीं करना चाहिए।
ऊंची एड़ी के जूते नहीं पहनने चाहिए।
टी।वी। तथा फिल्में आदि ज्यादा नहीं देखनी चाहिए।
इन पदार्थों के सेवन से बचें स्(
चाय, कॉफी, शराब, नशीली दवाईयां, धूम्रपान, सॉफ्ट ड्रिंक, तम्बाकू, पान, जर्दा तथा अन्य दूषित पदार्थ जिनसे शरीर को हानि होती हो, का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इन पदार्थों से शरीर का स्वास्थ्य केवल बेकार होता है सही कभी भी नहीं होता है।
चीनी, मैदा तथा पॉलिश किये हुए चावल का उपयोग नहीं करना चाहिए।
दूषित भोजन का सेवन न करें क्योंकि इसके सेवन से कई प्रकार के रोग हो सकते हैं और शरीर का स्वास्थ्य गिर सकता है।
रंगदार भोजन, फ्लेवर्ड, सिन्थेटिक, कृत्रिम खाद्य पदार्थ, डिब्बाबंद, ड्राइड तथा मिलावटी चीजों का सेवन न करें।
रिफाइंड तेलों का कम उपयोग करना चाहिए।
गैर(प्राकृतिक भोजन तथा पेय पदार्थों का उपयोग कम से कम करना चाहिए।
भूख न होने पर भोजन नहीं करना चाहिए।
ज्यादा चिंता नहीं करना चाहिए तथा किसी से नहीं डरना चाहिए।
ज्यादा गर्म तथा ज्यादा ठंडी चीजों का भोजन में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
वायु, जल तथा शोर वाले प्रदूषणों से बचना चाहिए।
हानिकारक प्रसाधन सामग्री व वस्त्र, औषधियुक्त साबुन व क्रीम का उपयोग नहीं करना चाहिए।
भोजन करने के समय में बीच(बीच में पानी नहीं पीना चाहिए।
भोजन करने के कम से कम ज्ञ घण्टे के बाद ही पानी पीना चाहिए।
रात के समय में देर से भोजन नहीं करना चाहिए।
भारी तथा ठोस भोजन नहीं करना चाहिए।
रात के समय में देर से नहीं सोना चाहिए।
अभ्यास स्(
अपनी आंखों को स्वस्थ बनाये रखने के लिए प्रतिदिन सुबह तथा शाम के समय में त्रिफला के पानी से आंखों को धोना चाहिए।
दिन में ज्ञ बार नमक मिले गुनगुने पानी से गरारे करने चाहिए, इसके फलस्वरूप स्वास्थ्य सही बना रहता है।
यदि कब्ज की शिकायत हो तो कुछ दिनों तक लगातार गुनगुने पानी से एनिमा क्रिया करनी चाहिए और पेट को साफ करना चाहिए।
स्वस्थ रहने के लिए सप्ताह में कम से कम ज्ञ बार वमन धौति क्रिया ९कुंजल या वमन० करनी चाहिए।
सप्ताह में कम से कम ज्ञ बार शरीर की मालिश करनी चाहिए तथा धूप(स्नान करना चाहिए, जिसके फलस्वरूप शरीर का स्वास्थ्य अच्छा बना रहता है।
प्रतिदिन सुबह के समय में अपने तालू पर अच्छी तरह मालिश करनी चाहिए।
हर समय खुश रहने की कोशिश करनी चाहिए तथा सभी व्यक्तियों से हंसना(बोलना चाहिए।
प्रतिदिन द्द बार माथे या आंखों पर पानी के छींटे मारने चाहिए तथा मुंह पर पानी मारना चाहिए जिसके फलस्वरूप स्वास्थ्य सही रहता है।
कुछ सावधानियां स्(
फलों और सब्जियों को खाने से पहले अच्छी तरह से धो लेना चाहिए तथा जो फल छीलकर खाने वाले हो उसे छीलकर ही खाने चाहिए।
किसी भी सब्जी तथा फलों को काटने से पहले अच्छी तरह से धो लेना चाहिए क्योंकि इन पर कीटनाशी तथा अन्य दूषित तत्व जमे होते हैं।
टी।वी। तथा पिक्चर आदि देखने के लिए उचित दूरी पर बैठकर देखें क्योंकि इससे आंखे खराब हो सकती हैं।
याद रखने लायक कुछ बातें स्(
औषधियां बीमारियों से ज्यादा खतरनाक होती हैं इसलिए औषधियों का उपयोग ज्यादा नहीं करना चाहिए।
स्वस्थ रहने के लिए पर्याप्त जगह, शुद्ध वायु, शुद्ध जल, धूप, व्यायाम तथा शारीरिक क्रिया करना बहुत ही आवश्यक हैं तथा इसके बाद उचित भोजन का करना आवश्यक है।
भोजन, नींद, व्यायाम तथा विश्राम सम्बंधी नियमों का पालन करना चाहिए तभी स्वास्थ्य ठीक प्रकार से बना रह सकता है।
किसी भी बीमार व्यक्ति के लिए जल औषधि तथा आहार दवा के सामान होता है अतस् किसी भी बीमारी को ठीक करने के लिए इनका उपयोग अधिक करना चाहिए।
किसी भी बीमारी को ठीक करने के लिए उपवास चिकित्सा का महत्वपूर्ण अंग है इसके द्वारा कई प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं।
किसी भी व्यक्ति को कोई भी कार्य करने के लिए जल्दबाजी नहीं करना चाहिए।
स्वस्थ रहने के लिए चिंता(फिक्र का त्याग कर देना चाहिए।
तेज मसालेदार तथा चिकनाईयुक्त सब्जियां व्यक्ति को बीमार कर देती हैं इसलिए इन चीजों का बहुत ही कम उपयोग करना चाहिए।
अच्छा स्वास्थ्य बनाये रखने के लिए कुछ आवश्यक बातों पर नजर स्(
सभी प्रकार के रोगों को ठीक करने की शक्ति शरीर में ही मौजूद होती है।
थकान, बीमारी, दर्द होने पर तथा तनाव की स्थिति या फिर जल्दबाजी में भोजन नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ता है।
किसी भी रोग को ठीक करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा का सहारा लेना चाहिए, क्योंकि यह चिकित्सा सर्वाधिक सुरक्षित और स्थायी होती है।
भोजन करने से आधा घण्टा पहले पानी पीना चाहिए तथा भोजन करने के कम से कम ज्ञ घण्टे के बाद ही पानी पीना चाहिए। भोजन करने के समय में कभी भी पानी नहीं पीना चाहिए।
रोग की अवस्था में उचित भोजन का ही उपयोग करना चाहिए तथा कभी भी ऐसा भोजन नहीं करना चाहिए जिससे बीमारी का प्रकोप और बढ़ जाए।
अच्छा स्वास्थ्य संतुलित भोजन और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण पर ही निर्भर करता है अतस् भोजन उतना ही करना चाहिए जितना आवश्यक हो।
नशीली चीजें, तम्बाकू, शराब तथा अन्य विषैले पदार्थों का उपयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि इन चीजों से स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ता है।
स्वस्थ रहने के लिए प्रतिदिन दिन में ज्ञण् से ज्ञद्द गिलास पानी पीना चाहिए।
रात के भोजन और सोने के बीच में कम से कम घ घण्टे का अन्तर रखना चाहिए इससे स्वास्थ्य सही रहता है।
धन से दवाई खरीदी जा सकती है स्वास्थ्य नहीं यह ध्यान रखना चाहिए।
चाय, कॉफी का ज्यादा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए क्योंकि इन चीजों से स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।
अनुशासित जीवन आपको दीर्घजीवी और खुशहाल बनाता है अतस् अपने जीवन में अनुशासित रूप अपनाना चाहिए।
परिवर्तन संसार का नियम है इसलिए इसके साथ(साथ छेड़(छाड़ नहीं करनी चाहिए।
शरीर, मस्तिष्क व आत्मा को शुद्ध रखने के लिए योग सबसे आसन तरीका है। इसलिए अपने जीवन में योग का अच्छी तरह से इस्तेमाल करना चाहिए।
किसी भी रोग को ठीक करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा और योग एक ही गाड़ी के द्द पहिए हैं।
रोग को ठीक करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा पर विश्वास करना बहुत ही आवश्यक है। इसके फलस्वरूप रोग जल्द ही ठीक हो जाता है।

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